अरे बूम ऊपर ले रे… life and work of a boom operator – Shaikh Gulam Hussain

Saikh Gulam Hussain is one of the finest Boom Operators for  live/Sync film sound in India. With 30 years of experience in the field , he has many milestone to his credit, including, Lagaan and Slumdog Millionair. 

His life and work in a way describes history of live sound as well as transformation of Indian cinema.When we are celebrating 100 years of Indian Cinema, has anythings changed for an average skilled worker like him in Indian film industry? 


Shaikh Gulam Hussain

आप फ़िल्म लाइन में कैसे आये?

हमारे वालिद शैख़ अब्दुल  फिल्मों में पहले लाइट मेन का  काम करते थे , मुगले आज़म पर भी उन्होंने काम किया। फिर बूम मेन कि तरह गंगा जमुना, कस्मे वादे, जॉनी मेरा नाम जैसी फिल्में की।  अब्बा नहीं चाहते थे कि मैं, फिल्मों  में काम करूँ , मगर हमारी कौम में पढाई लिखाई का माहौल नहीं था, उस वक़्त भी बूम मेन की माली हालत ख़राब ही होती थी।  पढाई लिखाई छूट गई टेलरिंग, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रीशियन का काम करने के बाद  पहुँच गए फ़िल्म के सेट पे…  83- 84 कि बात होगी अब्बा रजनीकान्त,जीनत अमान की एक फ़िल्म कर रहे थे डाकू हसीना, तीन दिन अब्बा ने हमें साथ में रखा और कहा चलो अब काम शुरू करो। फ़िल्म के रिकार्डिस्ट अखिलेश आचार्य थे इसलिए उन्हें पहला गुरु मानता हूँ। बाद में भगत सिंह राठौर,  राकेश रंजन, जीतेन्द्र चौधरी, जैसे कई रिकार्डिस्ट के साथ काम किया और सभी से कुछ न कुछ सीखने को मिला। 
तो कैसा लग रहा था काम ? 
holding boom on film set

काम तो पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ कर रहे थे, मगर  सच बोलू तो ऐसा नहीं लगता था कि कोई खास काम है या हुनर है। उस समय डबिंग होती थी शूट पर तो बस पायलट साउंड रिकॉर्ड किया जाता था ।  फिर एक बार हम लोग आउटडोर शूट के लिए बिहार के एक छोटे से गाँव में गए थे, उन दिनों फ़िल्म क़यामत से क़यामत तक के कैमरा वर्क कि इंडस्ट्री में बहुत चर्चा थी। यहाँ तक कि पब्लिक भी बढ़िया पिक्चर क्वालिटी कि बात कर रही थी। हम लोग भी उस गाँव के सिनेमा हाल में पहुँच गए, एकदम फटीचर हाल था। अब गिरे कि तब गिरे। फ़िल्म शुरू हुई , थोड़ी देर बाद पिक्चर दिखना बंद हो गयी, मगर साउंड चालू था, लोग चिल्लाये ” अरे पिक्चरवा पिक्चरवा “, कुछ देर बाद पिक्चर भी चालू हो गयी लोग शांत हो गए, फ़िल्म चलती रही।अब कुछ देर बाद साउंड बंद हो गया, पिक्चर चल रही थी, मगर लोगों ने जूते चप्पल फेंकना शुरू  कर दिया , शोर मचा दिया, फ़िल्म रुक गयी, थोड़ी देर बाद फ़िल्म को rewind  कर के फिर वहीँ से शुरू किया गया जहाँ साउंड बंद हुआ था…

तब मुझे लगा कि साउंड तो बहुत अहमियत रखता है, काम पर ध्यान दिया, फिर धीरे धीरे मज़ा भी आने लगा। हम टेलीविज़न सीरियल में बूम पर साउंड करते थे । प्रोडूसर का रेडियो माइक का खर्च बच जाता, हमें अच्छा काम करने का मौका मिलता और,  साउंड क्वालिटी तो बूम कि बेहतरीन होती ही है। अखिलेश आचार्य के साथ एक सीरियल किया त्रिकाल , जिसमे पहली बार मल्टी केमरा सेट-अप था।  साथ साथ कुछ फिल्मों के लिए नागरा पर पायलट साउंड रिकॉर्डिंग भी की। 

 

तो आपने लाइव/सिंक  साउंड के लिए बूम करना  कब शुरू किया?

91-92 में केतन मेहता की फ़िल्म सरदार के लिए रिकार्डिस्ट  भगत सिंह राठौर ने नागरा पर एक बूम के साथ साउंड रिकॉर्डिंग की गयी। यह मेरी पहली  लाइव साउंड फ़िल्म थी। रिकॉर्डिंग काफी अच्छी हुई पर सरदार पटेल बहुत शुद्ध हिंदी बोलते थे और परेशजी कि हिंदी में थोडा गुजराती टोन होने के कारण शायद कुछ डब करना पढ़ा।
94-95 में रिकार्डिस्ट पी एम् सतीश के साथ नचिकेत पटवर्धन कि मराठी फ़िल्म limited Manuski, भी लाइव साउंड के साथ शूट की गयी। जब पुणे में हम यह फ़िल्म शूट कर रहे थे तब रेसुल पोकुट्टी FTII में अपना डिप्लोमा कर रहे थे। किसको अंदाज़ा था कभी उनके साथ काम करूँगा और उनको  साउंड का ऑस्कर मिलेगा….

जल्दी ही देव बेनेगल कि फ़िल्म split wide open में रेसुल के साथ काम किया , इस फ़िल्म में कभी कभी एक साथ रेसुल और विक्रम, दो रिकार्डिस्ट दो , दो  डेट रिकॉर्डर्स पर होते मैं एक बूम प्लांट करता और दूसरा ऑपरेट करता।
इस फ़िल्म में राहुल बोस और लैला रोजेज का एक लव मकिंग का सीन था थोडा वाइड शॉट था, एक टेक के बाद लगा कि रेडियो माइक लगाना चाहिए , कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसे नाजुक सीन को शूट करते वक़्त जब आर्टिस्ट के बदन पर कपडे ना हो डारेक्टर साउंड के लिए रुकेगा, मगर देव बेनेगल साउंड को बहुत तब्बजो देते थे, आर्टिस्ट ने भी सपोर्ट किया, हमने कैमरा एंगल के हिसाब से छुपाकर माइक लगाये, फिर सीन आगे  शूट हुआ।फ़िल्म मेंकिंग तो टीम वर्क ही है, मगर लाइव साउंड के लिए पूरी टीम का extra सपोर्ट चाहिए ।
98 के आस-पास केट विंसलेट की हॉलीवुड फ़िल्म Holy Smoke का दस दिन का शेडूल इंडिया में शूट होना था, रिकार्डिस्ट बेन ओस्मो अपने साथ बूम ऑपरेटर भी लाये थे । मैं केबल मेन कि तरह शूट पर गया था। मगर बूम ऑपरेटर का मसल खिंच जाने से बूम मुझे करना पढ़ा । काम तो ज्यादा नहीं था मगर उनसे बात करने का मौका मिला । 
हमने तो कभी एक पेटी से ज्यादा साउंड का सामन देखा ही नहीं था और यहाँ पूरा मिनी ट्रक भरकर साउंड का सामान था। 40 क़िस्म के तो माइक थे , कूपर का मिक्सर डेट रिकॉर्डर, लगा …..इसे कहते हैं लाइव साउंड। ऊपर से बेन कहते  , छोटा schedule  होने के कारण थोडा ही सामन लाया हूँ , वाकी  शूट के लिए तो एक बस भरकर सामान लेकर चलता हूँ। कई और लोगों ने भी देखा सुना बात फैली, यहाँ भी कुछ हलचल हुई, लोग पता करना चाहते थे , लेकिन तब तक इंडिया www नहीं हुआ था। ……  
 

 मतलब इंटरनेट नहीं था !

हाँ , जो भी जानकारी मिल पाती थी मैगज़ीन या किताबों से ही मिलती थी, आज के जैसे सहूलियत नहीं थी ।. 

नकुल के साथ कैसे टीम बनी?

 मैंने तो  फ़िल्म इंडस्ट्री छोड़ने का मन बना लिया  था, एक रिकार्डिस्ट ने मेरा पैसा खा लिया था, बहुत बुरा वक़्त था, मन खट्टा हो गया था।  तभी हमारे दोस्त और Gaffer मूलचंद ने  मुझे फ़ोन किया। महेश मथाई और दीपक नायर एक फ़िल्म बना रहे थे भोपाल एक्सप्रेस जिसके रिकार्डिस्ट नकुल काम्टे थे, मैंने सोचा चलो मिल तो लेते हैं काम तो करना नहीं है , दस मिनट का काम सोच कर मैंने अपनी बीवी को  भी साथ ले लिया, मीटिंग के बाद रिश्तेदारी में जाना था।  बीवी को नीचे रोक कर हम ऊपर  गए नकुल के घर , नकुल तो कॉपी पेन लेके बैठे थे हर  सीन और शॉट को डिसकस करने के लिए, जब डेढ़ घंटा हो गया तो एक शॉट के लिए हमने कहा ,इस शॉट के वक़्त सूरज कहाँ  होगा वो भी बता दीजिये ? तब नकुल को भी लगा , हर चीज़ तो हमारे बस में नहीं है। मुझे  लगा कि कोई इतनी तैयारी कर रहा है , तो  काम करना चाहिए । भोपाल गैस ट्रेजेडी पर आधारित यह फ़िल्म रियल लोकेशंस पर शूट होनी थी , ट्रैन में भी शूट था । चैलेंजिंग काम था, और इंडिया में तब किसी के पास सही sound equipments नहीं थे, तो लॉस एंजेलिस की  लोकेशन साउंड सर्विस कंपनी से साउंड इक्विपमेंट किराये पर आये, काम शुरू हो गया …..हमारी एक टीम बन गई ।


फिर लगान आयी  ?

 हाँ ,वही  आमिर खान, जिनकी क़यामत से क़यामत तक  बिहार में देख कर मुझे साउंड की कीमत समझ में आयी थी , लगान लाइव साउंड के साथ शूट करना चाहते थे।  नकुल ने तैयारी शुरू कर दी, दीवानों कि तरह काम चल रहा था , लोकेशन का मुआयना, जनरेटर कितनी दूर रखना हैं? हवा किस तरफ चलती है? अब तो हमारे पास बेहतर डिजिटल रिकॉर्डर, अच्छे बूम माइक और रेडियो माइक भी आ गए थे, मगर ज्यादातर फ़िल्म बूम पर ही की गयी ।

Recordist Nakul Kamte with DOP Anil Mehta on Lagaan set

बहुत मुश्किल काम था 200-250 जूनियर आर्टिस्ट, बढ़ा crew  कई लाइटमेन, 20-25 लोग hair, make-up और costumes के, और किसी को लाइव साउंड के बारे में ज्यादा पता नहीं था ,

मगर नकुल के स्पीड (साउंड रोलिंग ) बोलते ही सेट पर सन्नाटा खिच जाता था, बात करना तो दूर मज़ाल है कि कोई सांस भी ले ले। लगान सुपरहिट हुई, ऑस्कर तक गयी अब इंडिया में लाइव/सिंक  साउंड को लोगों ने गम्भीरता से लिया।नकुल काम्टे ने लोकेशन साउंड को जो इज्जत दिलाई , वो पहले कभी देखी नहीं थी। लोकेशन तय करने के लिए कैमरामेन के साथ रिकार्डिस्ट जाने लगे ताकि शूट पर साउंड को दिक्कत न हो । उनसे  सलाह मशवरा किये बिना शूट का कोई फैसला नहीं लिया जाता था । मगर ये सब ज्यादा दिन तक नहीं चला । 

लाइव साउंड बहुत मंहगा था इसलिए ?

हाँ मंहगा तो था, लाइव साउंड में जितना पैसा मुझे मिलता बूम के लिए था उससे कम रेट पर उस समय रिकार्डिस्ट एक पूरी फ़िल्म का पायलट साउंड रिकॉर्ड करता था । तो आप समझो कि फर्क कितना ज्यादा था।
मगर लाइव साउंड एक फैशन सा हो गया था,विदेशी रिकार्डिस्ट भी यहाँ आकर काम कर रहे थे । कई लोगों ने एक साथ equipments खरीद लिए । हर कोई  रिकार्डिस्ट लाइव साउंड करना चाहता था ।  कई बार लाइव साउंड के नाम पर कई किलोमीटर तक साउंड लॉक-अप(silence) कराया जाता , फिर भी आधी से ज्यादा फ़िल्म कि डबिंग होती । producer  को नुकसान हुआ, लोग डरने लगे, मोल  भाव चालू हो गया, काम कम और लोग ज्यादा हो गए, लाइव साउंड का तो नुक्सान हुआ ही, जो लोग पायलट करते थे उनकी भी बुरी हालत हो गयी।

Slumdog  Millionaire का अनुभव कैसा था?

Dir. Danny Boyel,Recordist  Resul Pokutty on Slumdog Millionaire

यह कुछ अलग फ़िल्म थी, सात सात कैमरों से एक साथ शूट होता था, रेसुल का involvement बहुत था,
ढेर सारे माइक यहाँ वहाँ  प्लांट किये जाते…. कभी कभी तो 32 tracks तक रिकॉर्ड किये।
फ़िल्म के डारेक्टर डेनी बोयेल कहते  “फ़िल्म 70% साउंड और 30% पिक्चर है”. एक बार फिर वो बिहार का किस्सा याद आ गया। कभी सोचा नहीं था, फ़िल्म इतनी हिट हो जायेगी ?  रेसुल को ऑस्कर मिल गया. हमारे काम को पूरी दुनिया मान गयी… 

Foreign Production और Indian Production में क्या फर्क होता  है? 

वो लोग तैयारी करके आते हैं. सब टाइम पर आते हैं. १२ घंटे कि शिफ्ट है तो बस उतना ही देर काम होगा। टाइम पर लंच ब्रेक होगा,हफ्ते में एक दिन छुट्टी रहेगी। लोग कहते हैं उनके पास बहुत पैसा होता है, लेकिन बात पैसे कि नहीं है, एक दिन में वो लोग हमसे ज्यादा काम करते हैं, तो हिसाब बराबर हो जाता है। असल में लोग रिलैक्स होते हैं तो काम अच्छा होता। हर डिपार्टमेंट को एक सा देखा जाता हैं। खासतौर से साउंड का तो बहुत ध्यान रखते हैं। 
Indian Production में तो आर्टिस्ट टाइम पे नहीं आयेंगे, १२ घंटे कि शिफ्ट में भी रनिंग ब्रेक के नाम पे चैन से खाना भी नहीं खाने देंगे, डारेक्टर और असिस्टेंट्स खुद तो डाइट कोक और रेड बुल पीते रहेंगे और कोशिश करेंगे किसी तरह कैसे एक घंटे और ज्यादा शूट खीचां जाए ।प्रोडक्शन वाले गोरों  के आगे पीछे दुम हिलाते हुए घूमेंगे, फाइव स्टार होटल में रखेंगे , उनके सारे नखरे सहेंगे । मगर उसी काम के लिए अपने लोगों को आधा पैसा भी नहीं देंगे उल्टा कमीसन मांगेंगे conveyance तक के लिए परेशान करेंगे। 

अलग अलग रिकार्डिस्ट के साथ, काम  में कुछ फर्क आता हैं?

हमारा काम तो  है कि रिकार्डिस्ट को साउंड ट्राली से उठना न पढ़े… मगर सबकी अपनी अपनी स्टाइल होती है।
अभी विनोद सुबर्मनियम के साथ एक फ़िल्म कर कर रहा था Sold , ज्यादातर शूट दो मंजिला मकान में थी. साउंड ट्राली नीचे होती थी और विनोद कभी कभी ही ऊपर आते थे। रेडियो माइक पसंद नहीं करते।

रिकार्डिस्ट स्टेफेन गोम्स रेडियो माइक उपयोग ही नहीं करते पूरा साउंड बूम पर करते हैं। रेसुल सेट पर , लगातार बेहतर बूम एंगल या रेडियो माइक प्लांट करने कि जगह ढूँढता रहते हैं ।

एक बार तो मढ़ में एक पुराने चर्च कि दीवाल पे बूम लेकर मुझे चढ़ा दिया….उस वक़्त भी मेरा वजन 80-90Kg तो होगा, दो टेक के बाद मैं दीवाल के साथ गिरा… मगर मज़ा  है।

लाइव साउंड में और क्या मुश्किलें आती हैं?

यहाँ लोग लाख रुपये का माइक तो खरीद लेते हैं, मगर हज़ार रुपये का उसका क्लिप, या होल्डर नहीं खरीदते, मिक्सर खरीद लेंगे मगर उसका बैग यहाँ से सिल्वा लेंगे,जिससे काम के वक़्त बहुत परेशानी होती है।  अपने यहाँ ऐसे भी शोर शराबा बहुत है। पहले शूट के लिए Sound Proof स्टूडियो भी नहीं थे। लोगों को आदत नहीं है ,चुप रह कर काम करने की। ज्यादातर कैमरामेन या तो insecure हैं , या उनका ego है कि सेट पर उनके अलावा किसी कि आवाज़ नहीं आना चाहिए। पता नहीं अगर साउंड थोडा अच्छा हो जाये तो उनके बाप का क्या जाता है?  बार बार कहते हैं बूम ऊपर ले फ्रेम में बूम नहीं तो बूम shadow आने का रिस्क है। अरे भाई! फ़िल्म का धंधा ही रिस्क का है, करोड़ों कि फ़िल्म बनाते हैं फ्लॉप हो जाती है, रिस्क तो है ही।  आर्टिस्ट कि वजह से रिटेक होता है , फोकस कि वजह से रिटेक होता है ,एक बार बूम वालें ने गलती कर दो तो क्या गुनाह हो गया, हम भी इंसान हैं, मशीन तो नहीं। 
कुछ डायरेक्टर्स को फैशन में लाइव  साउंड तो करना हैं , मगर खुद कुछ बताना नहीं है और साउंड वाला पूछे भी न… कुछ गड़बड़ हो तो बोलते हैं इतना डब कर लेंगे, अरे जनाव पूरी फ़िल्म डबिंग ही क्यूँ नहीं कर लेते….डॉक्टर ने तो नहीं कहाँ लाइव साउंड करने को।
कुछ एक्टर्स भी होते हैं, माइक लेके उनके आगे पीछे घूमों,  फिर अगर माइक का बैटरी ख़त्म हो जाए तो जी हज़ूरी करो, बदलने  के लिए , अरे जनाव आपका ही परफॉरमेंस अच्छा होना है, हमारा क्या, नहीं तो करना जाके डबिंग।  फोकस वाले को दस बार मार्क देंगे, हर शॉट के बाद हेयर और मेक-अप देखेंगे, लेकिन माइक में थोडा रसल आए ,और रिकार्डिस्ट माइक की पोजीशन बदलना चाहे तो क़यामत आ जाती है.…पारा चढ़ने लगता है । 

तीस सालों में इस सब में क्या कुछ बदलाव देखते हैं?

एक किस्सा सुनाता हूँ…

with latest equipments on film set

खुदा गवाह फ़िल्म में बच्चन साहब का घोड़े पर वाइड शॉट में डायलॉग था,उन्होंने रेडियो माइक लगाने से मना कर दिया, रिकार्डिस्ट भगत सिंह राठौर ने  घोड़े कि गद्दी के नीचे कैसे तो भी माइक छुपा दिया।

बच्चन साहब ने  देख लिया…माइक निकालने को कहा और हमें निकालना पढ़ा. तब कलाकारों को माइक कि आदत नहीं थी कहते डबिंग तो करना ही है, तब देख लेंगे ।
सालों बाद फ़िल्म ‘क्यूँ हो गया ना’ फ़िल्म कि शूट के पहले दिन बच्चन साहब आये, और खुद से आवाज़ दी, अरे कोई माइक लगा दो। लेकिन रिकार्डिस्ट स्टेफेन गोम्स रेडियो माइक उपयोग ही नहीं करते पूरा साउंड बूम पर करते हैं। कहने का मतलब सभी लोगों का साउंड को लेके नजरिया बदला है, प्रोडक्शन , डारेक्टर,एक्टर्स , कैमरामैन अब साउंड को भी importance देते हैं। बेहतरीन से बेहतरीन equipment आज इंडिया में मौजूद हैं, पोस्ट में भी काफी काम होता है। इसलिए शूट पर लाइव साउंड का काम थोडा आसान हो गया है। 

सुना है , आप लोगों को बूम सिखाते भी हैं ?

देखिये हम तो काम करते करते और रिकार्डिस्ट से  बात करके लाइव साउंड कि बारीकियां सीख गए। इसलिए मेरे पास जो कला है, टेक्निक हैं उसे सिखाने/ बाटने से में कभी पीछे नहीं हटता। मेरे घर के पास युसूफ  इस्माइल कॉलेज है, वहाँ खाली वक़्त में नए लड़के को बुला कर ,१०-१२ फीट के डंडे पर माइक या लकड़ी बाँध कर बेसिक सिखाता हूँ। मेरे पास तो अपना बूम रोड भी नहीं है। मैं इसकी कोई फीस भी नहीं लेता
एक दो को छोड़कर , आज जो भी टॉप के बूम ऑपरेटर हैं जहांगीर, अकील, आरिफ, फ़िरोज़, मुश्ताक…. लगभग सब अपने पास से ही सीखे हैं। ये मेरे आस पड़ोस के लड़के हैं,  पूरा मोहल्ला बूम ऑपरेटर्स का मोहल्ला है, कमसे कम पंद्रह बीस बूम ऑपरेटर्स रहते हैं । मगर पिछले पांच सालों से अब ये बंद कर दिया है,  अब अगर कोई अपने बच्चे को लेके आते हैं तो मना कर देता हूँ…. 

 अरे क्यूँ ?

30 साल इस इंडस्ट्री में काम करने के बाद मुझे समझ में आया कि यह फील्ड बहुत मतलबी है, जब तक मतलब है ढीक है,  क्या करेंगे वो बच्चे बूम सीखकर ….  मंहगाई बढ़ रही है और पेमेंट घटता जा रहा है, जितना पैसा अटेंडेंट को मिलता था आज उस रेट पर बूम करना पढ़ रहा है । 
मेरी फ़िल्म को ऑस्कर अवार्ड मिला है फिर भी एक बार मेरे बच्चों को स्कूल से निकल दिया गया , फीस कि वजह से । ऐसे वक़्त लोगों को फ़ोन लगाओ तो एक SMS आ जाता हैं, i am busy call you back. फिर कभी फ़ोन नहीं आता । 

अभी हॉलीवुड रिकार्डिस्ट साइमन हैस आये थे पुणे इंस्टिट्यूट में वर्कशॉप लेने ,वो अपने लेक्चर में कह रहे थे , कि उन्होंने अपनी ४० फिल्में एक ही बूम ऑपरेटर के साथ की हैं। अपने यहाँ तो, कुछ रिकार्डिस्ट सब्जी भाजी लेने भेजते हैं, चेक बैंक में डालने जाओ. मैं खुद एक रिकार्डिस्ट कि गाड़ी धो चुका हूँ.इस पर भी जैसे ही कोई कम रेट पर काम करने वाला मिल जायेगा तो आपको लात मार कर निकाल दिया जाएगा । डिजिटल कैमरा आने के बाद अब मल्टी कैमरा से शूट होता है, ऐसे में बूम ऑपरेट करने कि जगह नहीं होती, तो जैसे एक टाइम सीरियल में हर आर्टिस्ट को माइक चिपकाने लगे और बूम वाले को निकाल दिया था , वैसे ही धीरे धीरे फ़िल्म से भी बूम ऑपरेटर को निकाल देंगे, और सिर्फ रेडियो माइक पर फ़िल्म होने लगेगीं ।

कौन निकाल देगा प्रोडक्शन ?

अरे नहीं! उन्हें तो साउंड कि बारीकियों का अता पता नहीं होता है, रिकार्डिस्ट लोग खुद बूम को निकाल देंगे….
आप थिएटर में जाके सुनो फुल वाइड शॉट में दुनिया जमाना दिख रहा है. मगर छाती पे लगे रेडियो माइक से ऐसी आवाज़ आती हैं मानों आर्टिस्ट माइक में घुस  के बोल रहा हो? मगर सब खुश हैं!!! इससे तो डब साउंड फिर भी अच्छा था।

तो आपको लगता है इस बुरे हाल के लिए खुद रिकार्डिस्ट जिम्मेदार हैं?

देखो भाई ! प्रोडक्शन तो कोशिश करेगा ही है कमसे कम पैसों में काम कराना, या पैसा देना ही न पढ़े तो और अच्छा। इसलिए कुछ हद तक तो रिकार्डिस्ट ही जिम्मेदार हैं, वो अगर काम से समझौता न करते तो यह हाल नहीं होता। कुछ लोगों ने फैक्ट्री खोल दी है…कई फिल्में एक साथ कर रहें हैं, पैसा कम हो तो इंस्टिट्यूट के लड़कों से काम कराते हैं जिनका डिप्लोमा भी नहीं पूरा हुआ। कोई रिकार्डिस्ट प्रोडूसर को इक्विपमेंट खरीदवा रहा है, कोई शूट से पोस्ट तक पूरा साउंड पैकज में कर रहा है।
सुना है टाइटेनिक फ़िल्म credits में 77 लोगों का नाम आता हैं साउंड टीम में… 
यहाँ एक ही आदमी recording, editing , dialogue cleaning, design सब कुछ कर रहा हैं, equipments, studio सब अपना, तो घुमा फिरा के रिकार्डिस्ट तो कहीं न कहीं से पैसा बना लेता हे मगर बूम ऑपरेटर का क्या…उसको तो पैकेज में अटेंडेंट के रेट पर काम करना पढ़ता है?
एक बार ,एक रिकार्डिस्ट पायलट साउंड के पैकेज कि बात कर रहा था, मैंने कहा पैसा कुछ कम है,  तो वो बोला, अरे दोस्त पैसा है तो, मैं तो पंखे कूलर ऐसी  सप्लाई करता हूँ , कभी कभी तो उनके साथ पूरा साउंड सेट-अप  फ्री में ही दे देता हूँ. इन ढेकेदार साब के पास साउंड यूनियन से रिकार्डिस्ट का कार्ड भी है।

साउंड यूनियन payments को लेकर नॉन-कोऑपेरशन** शुरू करने वाला था ?

ये बहुत ज़रूरी हो गया था।  सब लोग जब तक एक साथ आकर आवाज़ नहीं उठाएंगे तब तक कुछ नहीं  होगा। 
पेमेंट बढ़ना चाहिए और यूनियन के माध्यम से कॉन्ट्रैक्ट करने से काम बहुत काम आसान हो जायेगा। 

Sound Union facilitate Gulam after Slumdog Millionair Oscar Success

प्रोडूसर्स को भी समझना चाहिए, कि लोकेशन शूट से लेकर मिक्सिंग  तक साउंड रिकार्डिस्ट सबसे लम्बे समय तक टीम का हिस्सा होता है, और साउंड टीम का थोडा बहुत पेमेंट्स बढ़ा देने से कोई आफत नहीं आ जायेगी। उल्टा पेमेंट्स बढ़ेगी तो उनका फायदा ही होगा, लोग जब खुश हो कर काम करते हैं काम अच्छा ही होता है।

लेकिन वो इतनी आसानी से मानेंगे नहीं , इसलिए ज़रूरी है कि सब लोग साथ मे लड़ें , नहीं तो जो कुछ लोग लड़ रहें  हैं और अच्छा काम करना चाहते हैं , वो भी धीरे धीरे थक कर हथियार डाल देंगे ।

क्या लड़ाई सिर्फ पैसे कि हैं….

नहीं पैसे के साथ साथ सम्मान की भी बात है , शूट में जिस तरह साउंड टीम के साथ लोग वर्ताव किया जाता हैं ।

एक फ़िल्म के शूट पर 2nd बूम ऑपरेटर मुख्य टीम  के साथ खाने कि लाइन में लगा तो, स्पॉट बॉय ने उसे हाथ पकड़ के निकाल दिया वो कुछ बोल नहीं पाया, नया था। मैं शूट छोड़कर आ गया बात फ़िल्म के डाइरेक्टर प्रोडूसर को पता चली, मुझे वापस बुलवाया गया, स्पॉट टीम को डांटा गया, अब ज्यादातर यह दिक्कत नहीं आती।
देखो भाई बिना रोये तो माँ भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती. तो आवाज़ तो उठानी पढ़ेगी, और थोडा सब्र भी करना पढ़ेगा, दो फिल्मों में कम रेट पर काम करके जितना पैसा मिलता है, उतना ही पैसा एक फ़िल्म से मिले तो,ज्यादा लोगों को काम मिलेगा, सब लोग खुश रहेगें तब काम भी अच्छा होगा।
लगान के बाद भी एक बार तो लगातार चौदह महीनो तक हमारे पास कोई काम नहीं था, लेकिन हमने समझौता नहीं किया। पैसे कमाने के लिए तो मुम्बई में कहीं भी बड़ा पाँव  या पान का ठेला लगाकर भी पैसा कमाया जा सकता हैं। अगर अपने आप पर भरोसा है ,काम आता है तो कम पैसे पर घटिया काम करके क्यूँ अपनी बेइजत्ती करे।

 बहुत बहुत शुक्रिया गुलाम भाई ,आप इसी तरह काम करते रहें ! उम्मीद है कभी एक फ़िल्म आपके साथ करूँ 

अरे ज़रूर क्यों नहीं , आप जैसे नए लोगों के साथ काम करने में बहुत मज़ा आता है. मैं तो बस इतना चाहता हूँ कि साउंड में बहुत अच्छा काम हो,  काम करने वालों को पैसे के साथ थोडा इज्ज़त  मिले बस .

 **This interview was done keeping in mind the proposed non-cooperation by sound union from 08th Dec2013,which was cancelled after the assurance from the producer’s guild, to look into the mater.
 



Advertisements